इस बार के लोकसभा चुनावों में कई ऐसे मुद्दे हैं, जो चर्चा का
केंद्र बने हैं। इन्हीं मुद्दों में से एक है नरेंद्र मोदी का गुजरात मॉडल। मोदी गुजरात
के विकास का मॉडल पेश करके इसे पूरे देश में लाने की बात कर रहे हैं, तो वहीं अन्य
राजनीतिक दलइस मॉडल को व्यर्थ बता रहे हैं। आखिर क्या है ये गुजरात मॉडल? क्या यह वाकई में उपयोगी है या
महज दिखावा?
दरअसल गुजरात मॉडल में कुछ तो खास बात है जो इसे अन्य राज्यों
के मॉडल से अलग बनाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका बिजनेस फ्रेंडली होना। बिजनेस
की समझ गुजरात के लोगों की रगों में है। मोदी ने भी राज्य को लंबी राजनीतिक स्थिरता
देकर व्यापार को पनपने का मौका दिया। उन्होंने प्रदेश में प्रशासनिक सुस्ती को भी कम
किया, जिसके कारण यहां निवेश बढ़ा है। इस मॉडल में कृषि पर खासा ध्यान दिया गया है।
नतीजतन 2000 में गुजरात में एग्रीकल्चरल ग्रोथ 9.8 फीसदी रही। गुजरात में 2012 में बेरोजगारी दर 1 प्रतिशत थी, जो पूरे देश में न्यूनतम
थी।
लेकिन कई ऐसे क्षेत्र
भी हैं, जहां यह गुजरात मॉडल फेल होता है। खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण
मुद्दों पर। यूनियन मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के 2012 के आंकड़ों के
मुताबिक पब्लिक हेल्थ सेंटर्स में 34 फीसदी डॉक्टरों की कमी है, जबकि राष्ट्रीय स्तर
पर यह आंकड़ा 10 प्रतिशत है। गुजरात में हर 10 हजार बच्चों के जन्म पर 122 प्रसूताओं
की मौत होती है। जबकि केरल में यह आंकड़ा 66 और महाराष्ट्र में 87 है। यहां शिशु मृत्यु
दर भी की अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा है। शिक्षा की बात करें तो एक सर्वें के मुताबिक
गुजरात में हायर सेकेंड्री और इंटरमीडिएट में टीचर-स्टूडेंट का अनुपात 54 है, जबकि
राष्ट्रीय औसत 32 छात्रों पर एक टीचर का है। यहां के स्कूलों में डॉपआउट रेट भी 58
फीसदी है। 2013 की एक रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात के इंजीनियरिंग कॉलेजों में 1700 पोस्ट
खाली हैं।
साफ है कि गुजरात मॉडल में निःसंदेह कुछ अच्छी और प्रभावी बाते
हैं मगर व्यापक स्तर पर इसे अमल में लाने के लिए इसे और तराशने की जरूरत है।
