हर शख्स के व्यक्तित्व में उत्थान-पतन और शुभ-अशुभ की क्षमता होती है. बस उसे परखने की आवश्यकता होती है. - पाॅल हैरिस
Thursday, 25 December 2014
Wednesday, 7 May 2014
आखिर क्या है ये गुजरात मॉडल...?
इस बार के लोकसभा चुनावों में कई ऐसे मुद्दे हैं, जो चर्चा का
केंद्र बने हैं। इन्हीं मुद्दों में से एक है नरेंद्र मोदी का गुजरात मॉडल। मोदी गुजरात
के विकास का मॉडल पेश करके इसे पूरे देश में लाने की बात कर रहे हैं, तो वहीं अन्य
राजनीतिक दलइस मॉडल को व्यर्थ बता रहे हैं। आखिर क्या है ये गुजरात मॉडल? क्या यह वाकई में उपयोगी है या
महज दिखावा?
दरअसल गुजरात मॉडल में कुछ तो खास बात है जो इसे अन्य राज्यों
के मॉडल से अलग बनाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका बिजनेस फ्रेंडली होना। बिजनेस
की समझ गुजरात के लोगों की रगों में है। मोदी ने भी राज्य को लंबी राजनीतिक स्थिरता
देकर व्यापार को पनपने का मौका दिया। उन्होंने प्रदेश में प्रशासनिक सुस्ती को भी कम
किया, जिसके कारण यहां निवेश बढ़ा है। इस मॉडल में कृषि पर खासा ध्यान दिया गया है।
नतीजतन 2000 में गुजरात में एग्रीकल्चरल ग्रोथ 9.8 फीसदी रही। गुजरात में 2012 में बेरोजगारी दर 1 प्रतिशत थी, जो पूरे देश में न्यूनतम
थी।
लेकिन कई ऐसे क्षेत्र
भी हैं, जहां यह गुजरात मॉडल फेल होता है। खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण
मुद्दों पर। यूनियन मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के 2012 के आंकड़ों के
मुताबिक पब्लिक हेल्थ सेंटर्स में 34 फीसदी डॉक्टरों की कमी है, जबकि राष्ट्रीय स्तर
पर यह आंकड़ा 10 प्रतिशत है। गुजरात में हर 10 हजार बच्चों के जन्म पर 122 प्रसूताओं
की मौत होती है। जबकि केरल में यह आंकड़ा 66 और महाराष्ट्र में 87 है। यहां शिशु मृत्यु
दर भी की अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा है। शिक्षा की बात करें तो एक सर्वें के मुताबिक
गुजरात में हायर सेकेंड्री और इंटरमीडिएट में टीचर-स्टूडेंट का अनुपात 54 है, जबकि
राष्ट्रीय औसत 32 छात्रों पर एक टीचर का है। यहां के स्कूलों में डॉपआउट रेट भी 58
फीसदी है। 2013 की एक रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात के इंजीनियरिंग कॉलेजों में 1700 पोस्ट
खाली हैं।
साफ है कि गुजरात मॉडल में निःसंदेह कुछ अच्छी और प्रभावी बाते
हैं मगर व्यापक स्तर पर इसे अमल में लाने के लिए इसे और तराशने की जरूरत है।
Saturday, 26 April 2014
महज वोट बैंक नहीं है मुसलमान
इन दिनों चुनावी मौसम चल रहा है। सभी बड़ी छोटी पार्टियां वोट
हथियाने के लिए अपने तरकश के सारे तीर आजमा रही हैं। काफी परिवर्तन भी देखने को मिल
रहे हैं इस चुनाव में ,जो कि स्वाभाविक भी है। मगर जो एक बात हर चुनाव की तरह इस बार
भी चर्चा में है वो है 'मुस्लिम वोट बैंक'। ये एक
ऐसा शब्द है जो हमेशा से ही राजनीतिक पार्टी की आंखों में चमक लाता रहा है। चुनाव में
मुस्लिम वोट हथियाना हर पार्टी का प्रयास रहता है। आखिर ऐसा क्या है मुस्लिम समुदाय
के वोट में..क्यों हर पार्टी इन्हें झपटने के लिए जोर आजमाइश करती रहती हैं.. और इन
सब से बड़ा भी एक सवाल, कि क्या मुस्लमान महज वोट बैंक हैं?
चुनावी मौसम में हर पार्टी की आंखों में चौंधियाने के बावजूद
क्या आज तक मुस्लमानों को वो हक मिला है जिसके वो हकदार हैं?
अगर बात महज वोट बैंक की करें, तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुस्लमानों
को ही वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है । 1990 के करीब से 2004 के चुनाव तक राम मंदिर
के मुद्दे को लेकर हिंदू वोट बैंक का भी जमकर दोहन किया गया था। मगर 2004 में एनडीए
सरकार के जाने के बाद राम मंदिर का मुद्दा भी कुछ ठंडा पड़ गया औऱ हिंदू वोट बैंक भी।
मगर आजादी के 67 साल और 15 आम चुनावों के बाद भी 'मुस्लिम वोट बैंक' नाम का शब्द अस्तित्व
में है। मुस्लमानों का कम साक्षरता प्रतिशत, उनमें अल्पसंख्यक होने का भाव या कोई अन्य..
कारण जो भी हो, मगर राजनीतिक पार्टियां कब मुस्लमानों को एक वोट बैंक के तौर पर देखना
बंद करेंगी?
वास्तव में अब भारतीय मुस्लमान कोई वोट बैंक नहीं रह गए हैं,
बल्कि उससे कहीं ज्यादा परिपक्व भूमिका निभा रहे हैं। कुछ कारण हैं जो राजनीतिक दलों
के मुस्लमान वोट बैंक वाले नजरिये को बदलने की वकालत करते हैं।
पहला कारण । भारतीय जनता पार्टी और मुस्लमानों के बीच की खाई
पट रही है, इससे बदलाव का इशारा मिल रहा है।
राजनैतिक दलों का मानना है कि हिंदूवादी सोच का समर्थक माने जाने के कारण भाजपा या
उसके पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे औऱ ये वोट अन्य दलों
के खाते में जाएंगे। दरअसल भाजपा की छवि भले ही हिंदूवादी दल की हो मगर ऐसा नहीं है
कि मुस्लमान भाजपा को या मोदी को सिरे से खारिज कर रहे हैं। हाल के दिनों में कुछ मुस्लिम
धर्म गुरू खुलकर मोदी के पक्ष में भी बोल चुके हैं। इससे पहले 2012 के गुजरात विधानसभा
चुनाव में भी भाजपा को 31 प्रतिशत वोट मिले थे,साथ ही 12 मुस्लिम बाहुल्य सीट में से 8 पर भाजपा को जीत मिली
थी। साफ है कि भाजपा के साथ भी मुस्लिम जुड़ रहे हैं। ऐसे में भाजपा सहित सभी अन्य
पार्टियों को उतने ही मुस्लिम वोट मिलेंगे, जितने मुस्लमान वाकई में पार्टी या कैंडिडेट
से प्रभावित होंगे।
दूसरा कारण। वोट बैंक का महत्व तब है जब ये सभी वोट किसी एक
पार्टी के खाते में जाएं, मगर ऐसा होने के आसार कम ही दिख रहे हैं। कोई भी दल मुस्लमानों
की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में नाकाम रहा है। पिछले 10 साल में कांग्रेस के शासनकाल
में भी मुस्लमानों के लिए कोई खास बात निकल कर सामने नहीं आई। ऐसे में भाजपा-कांग्रेस
सहित कोई भी राजनीतिक दल थोक में मुस्लमानों के वोट पाने की उम्मीद न रखे तो ही बेहतर
होगा।
तीसरा कारण। मुस्लिम संप्रदाय की सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है।
बात अगर जनप्रतिनिधि चुनने की हो तो इसमें भी वे जाति-धर्म से ऊपर उठ कर अच्छे-बुरे
की व्यापक समझ के साथ सामने आ रहे हैं। पिछले सालों में मुस्लमानों में साक्षरता बढ़ी
है। साथ ही अधिक व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले मुस्लिम युवाओं के वोट बड़ा फैक्टर साबित
होंगे।
साफ है कि 16वें लोकसभा चुनाव में देश के मुस्लिम मतदाता भी
एक नए तेवर और सोच के साथ मतदान को तैयार हैं। वे सिर्फ एक वोट बैंक नहीं बल्कि जागरूक
मतदाता का रोल निभाने को पूरी तरह तैयार हैं। मुस्लमानों को महज एक वोट बैंक मानकर
उनके सामूहिक वोट के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने वाले राजनीतिक दलों को अब
इस मुगालते से बाहर आ जाना चाहिए। भारत का लोकतंत्र एक नया अध्याय लिखने को तैयार है...
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