इन दिनों चुनावी मौसम चल रहा है। सभी बड़ी छोटी पार्टियां वोट
हथियाने के लिए अपने तरकश के सारे तीर आजमा रही हैं। काफी परिवर्तन भी देखने को मिल
रहे हैं इस चुनाव में ,जो कि स्वाभाविक भी है। मगर जो एक बात हर चुनाव की तरह इस बार
भी चर्चा में है वो है 'मुस्लिम वोट बैंक'। ये एक
ऐसा शब्द है जो हमेशा से ही राजनीतिक पार्टी की आंखों में चमक लाता रहा है। चुनाव में
मुस्लिम वोट हथियाना हर पार्टी का प्रयास रहता है। आखिर ऐसा क्या है मुस्लिम समुदाय
के वोट में..क्यों हर पार्टी इन्हें झपटने के लिए जोर आजमाइश करती रहती हैं.. और इन
सब से बड़ा भी एक सवाल, कि क्या मुस्लमान महज वोट बैंक हैं?
चुनावी मौसम में हर पार्टी की आंखों में चौंधियाने के बावजूद
क्या आज तक मुस्लमानों को वो हक मिला है जिसके वो हकदार हैं?
अगर बात महज वोट बैंक की करें, तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुस्लमानों
को ही वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है । 1990 के करीब से 2004 के चुनाव तक राम मंदिर
के मुद्दे को लेकर हिंदू वोट बैंक का भी जमकर दोहन किया गया था। मगर 2004 में एनडीए
सरकार के जाने के बाद राम मंदिर का मुद्दा भी कुछ ठंडा पड़ गया औऱ हिंदू वोट बैंक भी।
मगर आजादी के 67 साल और 15 आम चुनावों के बाद भी 'मुस्लिम वोट बैंक' नाम का शब्द अस्तित्व
में है। मुस्लमानों का कम साक्षरता प्रतिशत, उनमें अल्पसंख्यक होने का भाव या कोई अन्य..
कारण जो भी हो, मगर राजनीतिक पार्टियां कब मुस्लमानों को एक वोट बैंक के तौर पर देखना
बंद करेंगी?
वास्तव में अब भारतीय मुस्लमान कोई वोट बैंक नहीं रह गए हैं,
बल्कि उससे कहीं ज्यादा परिपक्व भूमिका निभा रहे हैं। कुछ कारण हैं जो राजनीतिक दलों
के मुस्लमान वोट बैंक वाले नजरिये को बदलने की वकालत करते हैं।
पहला कारण । भारतीय जनता पार्टी और मुस्लमानों के बीच की खाई
पट रही है, इससे बदलाव का इशारा मिल रहा है।
राजनैतिक दलों का मानना है कि हिंदूवादी सोच का समर्थक माने जाने के कारण भाजपा या
उसके पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे औऱ ये वोट अन्य दलों
के खाते में जाएंगे। दरअसल भाजपा की छवि भले ही हिंदूवादी दल की हो मगर ऐसा नहीं है
कि मुस्लमान भाजपा को या मोदी को सिरे से खारिज कर रहे हैं। हाल के दिनों में कुछ मुस्लिम
धर्म गुरू खुलकर मोदी के पक्ष में भी बोल चुके हैं। इससे पहले 2012 के गुजरात विधानसभा
चुनाव में भी भाजपा को 31 प्रतिशत वोट मिले थे,साथ ही 12 मुस्लिम बाहुल्य सीट में से 8 पर भाजपा को जीत मिली
थी। साफ है कि भाजपा के साथ भी मुस्लिम जुड़ रहे हैं। ऐसे में भाजपा सहित सभी अन्य
पार्टियों को उतने ही मुस्लिम वोट मिलेंगे, जितने मुस्लमान वाकई में पार्टी या कैंडिडेट
से प्रभावित होंगे।
दूसरा कारण। वोट बैंक का महत्व तब है जब ये सभी वोट किसी एक
पार्टी के खाते में जाएं, मगर ऐसा होने के आसार कम ही दिख रहे हैं। कोई भी दल मुस्लमानों
की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में नाकाम रहा है। पिछले 10 साल में कांग्रेस के शासनकाल
में भी मुस्लमानों के लिए कोई खास बात निकल कर सामने नहीं आई। ऐसे में भाजपा-कांग्रेस
सहित कोई भी राजनीतिक दल थोक में मुस्लमानों के वोट पाने की उम्मीद न रखे तो ही बेहतर
होगा।
तीसरा कारण। मुस्लिम संप्रदाय की सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है।
बात अगर जनप्रतिनिधि चुनने की हो तो इसमें भी वे जाति-धर्म से ऊपर उठ कर अच्छे-बुरे
की व्यापक समझ के साथ सामने आ रहे हैं। पिछले सालों में मुस्लमानों में साक्षरता बढ़ी
है। साथ ही अधिक व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले मुस्लिम युवाओं के वोट बड़ा फैक्टर साबित
होंगे।
साफ है कि 16वें लोकसभा चुनाव में देश के मुस्लिम मतदाता भी
एक नए तेवर और सोच के साथ मतदान को तैयार हैं। वे सिर्फ एक वोट बैंक नहीं बल्कि जागरूक
मतदाता का रोल निभाने को पूरी तरह तैयार हैं। मुस्लमानों को महज एक वोट बैंक मानकर
उनके सामूहिक वोट के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने वाले राजनीतिक दलों को अब
इस मुगालते से बाहर आ जाना चाहिए। भारत का लोकतंत्र एक नया अध्याय लिखने को तैयार है...
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